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श्री शिव आरती: भक्तिमय पाठ | Shiv Aarti Hindi Lyrics

🌺 शिव आरती क्या है?

शिव आरती भगवान शिव को समर्पित एक पवित्र स्तुति है। भगवान शिव को संहार, तप, वैराग्य और करुणा का प्रतीक माना जाता है। शिव आरती का नियमित पाठ मानसिक शांति, आत्मबल और जीवन के कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है। विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।

 

📿 शिव आरती

🔹 आरती


ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥


एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥


दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे॥


अक्षमाला बनमाला, मुण्डमालाधारी।
चंदन मृगमद सोहे, भाले शशिधारी॥


श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे॥


कर के मध्य कमंडलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी, जगपालनकारी॥


ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये, ये तीनों एका॥


काशी में विश्वनाथ विराजत, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दरशन पावत, महिमा अति भारी॥


त्रिगुण शिवजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावै॥

 

🌸 शिव आरती का भाव

शिव आरती का भाव वैराग्य, तप, शांति और आत्मबोध का संदेश देता है। यह सिखाती है कि जीवन के सुख और दुख दोनों में संतुलन बनाए रखना ही सच्ची भक्ति है। भगवान शिव की आराधना अहंकार का नाश कर आत्मिक शांति और विवेक प्रदान करती है।

 

📖 शिव आरती – पूर्ण पाठ और उसका अर्थ

🔹 पद 1


ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

अर्थ:
भगवान शिव ओंकार स्वरूप हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों उन्हीं में समाहित हैं, और माँ पार्वती उनके अर्द्धांग में विराजमान हैं।

🔹 पद 2


एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥

अर्थ:
भगवान शिव विभिन्न स्वरूपों में विराजमान हैं और सभी देवताओं के वाहन उनके अधीन हैं, जो उनकी सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है।

🔹 पद 3


दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे॥

अर्थ:
शिव के विभिन्न भुजाओं वाले रूप त्रिगुणात्मक ब्रह्मांड और उनकी सर्वव्यापक शक्ति को दर्शाते हैं।

🔹 पद 4


अक्षमाला बनमाला, मुण्डमालाधारी।
चंदन मृगमद सोहे, भाले शशिधारी॥

अर्थ:
भगवान शिव का श्रृंगार वैराग्य, ज्ञान और काल पर विजय का प्रतीक है।

🔹 समापन पद


त्रिगुण शिवजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावै॥

अर्थ:
जो भक्त श्रद्धा से भगवान शिव की आरती करता है, उसे मनोवांछित फल, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।