श्री शिव चालीसा: भक्तिमय पाठ | Shiv Chalisa Hindi Lyrics
🌺 शिव चालीसा क्या है?
शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में रचित एक पावन स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव के स्वरूप, करुणा, पराक्रम और भक्तवत्सलता का वर्णन किया गया है। शिव चालीसा का नियमित पाठ भय, रोग, मानसिक अशांति और जीवन के कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है। विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
📿 श्री शिव चालीसा
🔹 दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
🔹 चौपाई
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत संतन प्रतिपाला॥
भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुंडल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मुनि मोहे॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दी गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहि कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
नीलकंठ तब नाम कहाई। विष पियो तब अमरता पाई॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शंभु सहाई॥
🌸 शिव चालीसा का भाव
शिव चालीसा का भाव वैराग्य, करुणा और आत्मबोध का संदेश देता है। यह सिखाती है कि भगवान शिव केवल संहारक नहीं बल्कि करुणा, तप और संरक्षण के प्रतीक हैं। शिव चालीसा का पाठ भक्त के भीतर धैर्य, शांति और आत्मविश्वास जाग्रत करता है।
📖 शिव चालीसा – पद-वार अर्थ
🔹 दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
अर्थ:
कवि सबसे पहले भगवान गणेश और माता गिरिजा के पुत्र श्री गणेश का स्मरण करते हैं और फिर भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे मंगल प्रदान करें और जीवन के सभी भय दूर कर आशीर्वाद दें।
🔹 पद 1
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत संतन प्रतिपाला॥
अर्थ:
भगवान शिव माता गिरिजा के पति हैं और दीन-दुखियों पर अत्यंत दयालु हैं। वे सदा अपने भक्तों और संतों की रक्षा करते हैं।
🔹 पद 2
भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुंडल नागफनी के॥
अर्थ:
भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान है और उनके कानों में नाग के आकार के कुंडल हैं, जो उनके योगी स्वरूप को दर्शाते हैं।
🔹 पद 3
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
अर्थ:
शिव का शरीर भस्म से विभूषित है और उनके मस्तक से गंगा प्रवाहित होती है, जो पवित्रता और मोक्ष का प्रतीक है।
🔹 पद 4
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मुनि मोहे॥
अर्थ:
भगवान शिव बाघ की खाल धारण करते हैं। उनका वैराग्यपूर्ण स्वरूप ऋषि-मुनियों को भी मोहित करता है।
🔹 पद 5
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
अर्थ:
भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल है, जो अधर्म और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक है।
🔹 पद 6
नन्दी गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
अर्थ:
नंदी और गणेश भगवान शिव के समीप उसी प्रकार शोभायमान हैं जैसे समुद्र के बीच कमल।
🔹 पद 7
देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥
अर्थ:
जब भी देवताओं ने संकट में भगवान शिव को पुकारा, उन्होंने तुरंत उनके दुखों का निवारण किया।
🔹 पद 8
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहि कृपा कर लीन बचाई॥
अर्थ:
भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध कर देवताओं की रक्षा की और अपनी कृपा से सबको बचाया।
🔹 पद 9
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
अर्थ:
भागीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा को धारण कर उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।
🔹 पद 10
नीलकंठ तब नाम कहाई। विष पियो तब अमरता पाई॥
अर्थ:
समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने विषपान किया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए और सृष्टि की रक्षा हुई।
🔹 समापन पद
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शंभु सहाई॥
अर्थ:
जो भक्त श्रद्धा और एकाग्रता से शिव चालीसा का पाठ करता है, भगवान शिव सदा उसकी सहायता करते हैं।






